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ग़ज़ल
तमाम इल्म ज़ीस्त का गुज़िश्तगाँ से ही हुआ
अमल गुज़िश्ता दौर का मिसाल में मिला मुझे
मुनीर नियाज़ी
नज़्म
इतना मालूम है!
आप को इल्म है वो आज नहीं आई हैं?
मेरी हर दोस्त से उस ने यही पूछा होगा
परवीन शाकिर
ग़ज़ल
सिराज औरंगाबादी
नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
मैं अपने शहर-ए-इल्म-ओ-फ़न का था इक नौजवाँ काहिन
मिरे तिल्मीज़-ए-इल्म-ओ-फ़न मिरे बाबा के थे हम-सिन
जौन एलिया
ग़ज़ल
ये अक़्ल ओ दिल हैं शरर शोला-ए-मोहब्बत के
वो ख़ार-ओ-ख़स के लिए है ये नीस्ताँ के लिए
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
निस्बत-ए-'इल्म है बहुत हाकिम-ए-वक़्त को अज़ीज़
उस ने तो कार-ए-जहल भी बे-उलमा नहीं किया
जौन एलिया
नज़्म
ख़ुदा का सवाल
ये अक़्ल-ओ-ज़हानत शुऊ'र-ओ-नज़र
ये बस्ती ये सहरा ये ख़ुश्की ये तर

