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नज़्म
शाम को रास्ते पर
एक चालाक जहाँ-दीदा ओ बे-बाक सितम-गर बन कर
धोका देने के लिए आता है बहकाता है
मीराजी
ग़ज़ल
नफ़स बहकाता है पीरी में तो कहता हूँ 'सख़ा'
क्यूँ ब-शैतान तिरी अब भी शरारत न गई
सय्यद नज़ीर हसन सख़ा देहलवी
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ग़ज़ल
कब महकेगी फ़स्ल-ए-गुल कब बहकेगा मय-ख़ाना
कब सुब्ह-ए-सुख़न होगी कब शाम-ए-नज़र होगी
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
दिल की बातें नहीं है तो दिलचस्प ही कुछ बातें हों
ज़िंदा रहना है तो दिल को बहलाना तो होगा
जावेद अख़्तर
नज़्म
मिरे हमदम मिरे दोस्त!
गर मुझे इस का यक़ीं हो मिरे हमदम मरे दोस्त
रोज़ ओ शब शाम ओ सहर मैं तुझे बहलाता रहूँ