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तंज़-ओ-मज़ाह
पतरस बुख़ारी
ग़ज़ल
बस अपनी बेबसी की सातवीं मंज़िल में ज़िंदा हूँ
यहाँ पर आग भी रहती है और नौहा भी रहता है
साक़ी फ़ारुक़ी
तंज़-ओ-मज़ाह
मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी
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