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क़ितआ
बुख़्ल है अहल-ए-वतन से जो वफ़ा में तुम को
क्या बुज़ुर्गों की वो सब जूद-ओ-अता भूल गए
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
बुख़्ल से मंसूब करते हैं ज़माने को सदा
गर कभी तौफ़ीक़-ए-ईसार ओ अता पाते हैं हम
अल्ताफ़ हुसैन हाली
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bhuul
भूल بُھول
क़ुसूर,दोष,लग़्ज़िश, गुनाह,ग़लती,चूक,अज्ञान,असावधानता, भ्रम आदि के कारण कुछ का कुछ समझने और उसके फल-स्वरूप कोई अनुचित या गलत काम करने की अवस्था, या भाव, फ़ख़्र, घमंड
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ग़ज़ल
अर्श मलसियानी
नज़्म
ये तमाशा-गह-ए-आलम क्या है
बे-सबब बुख़्ल फ़रावाँ-बख़्शी
क़हत आलाम मसाइब के पहाड़
तसद्द्क़ हुसैन ख़ालिद
ग़ज़ल
जो बे-तलब मुझे बख़्शा था माँगने पे भी दे
करीम बुख़्ल ये कैसा है लुत्फ़-ए-आम के बा'द
मुनव्वर लखनवी
ग़ज़ल
आसमाँ पर ता'न-ए-बुख़्ल अहल-ए-ज़मीं को है अबस
पानी पानी हो गया जब दाना दाना हो चुका
हातिम अली मेहर
ग़ज़ल
बुख़्ल है करते नहीं ख़्वाबों की ख़ुशियों में शरीक
आओ हम देते हैं तुम को जो हमारे ख़्वाब हैं
गुफ़्तार ख़याली
ग़ज़ल
जौर-ओ-जफ़ा में बुख़्ल निगाह-ए-करम में उज़्र
ये क्या सुलूक है दिल-ए-दर्द-आश्ना के साथ



