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ग़ज़ल
आपस में आज दस्त-ओ-गरेबाँ है रोज़ ओ शब
ऐ मेहर-वश ज़री का नहीं मू-ए-बाफ़-ए-ज़ुल्फ़
बहादुर शाह ज़फ़र
समस्त
aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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आपस में आज दस्त-ओ-गरेबाँ है रोज़ ओ शब
ऐ मेहर-वश ज़री का नहीं मू-ए-बाफ़-ए-ज़ुल्फ़