दिल तो पज़मुर्दा है दाग़-ए-गुल्सिताँ हों तो क्या

मुनीर शिकोहाबादी

दिल तो पज़मुर्दा है दाग़-ए-गुल्सिताँ हों तो क्या

मुनीर शिकोहाबादी

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    दिल तो पज़मुर्दा है दाग़-ए-गुल्सिताँ हों तो क्या

    आँखें रोती हैं दहान-ए-ज़ख़्म ख़ंदाँ हों तो क्या

    दाग़-ए-ग़म दिल पर उठा कर मरने वाले मर गए

    बुर्ज क़ब्रों के अगर सर्व-ए-चराग़ाँ हों तो क्या

    बेगमें शहज़ादियाँ फिरने लगीं ख़ाना-ख़राब

    अब चुड़ैलें साहिबान-ए-क़स्र-ओ-दीवाँ हों तो क्या

    फ़र्श-ए-ख़ाक अब अहल-ए-मसनद को नहीं होता नसीब

    बोरिया-बाफ़ आज ज़ेब-ए-तख़्त-ए-सुल्ताँ हों तो क्या

    मस्जिदें टूटी पड़ी हैं सौमेए वीरान हैं

    याद-ए-हक़ में एक दो दिल-हा-ए-सोज़ाँ हों तो क्या

    सूफ़ियान-ए-साफ़-तीनत वासिल-ए-हक़ हो गए

    ख़ुद-नुमा दो चार नंग-ए-अहल-ए-इरफ़ाँ हों तो क्या

    बुझ गईं शमएँ जलें परवाने तो क्या फ़ाएदा

    उड़ गए परवाने शमएँ नूर-अफ़शाँ हूँ तो क्या

    सख़्त-जान बे-हया दो चार हम से जो रहे

    हर घड़ी पाबंद-ए-ख़ौफ़-ए-इज़्ज़त-ओ-जाँ हों तो क्या

    कर्बला में या नजफ़ में चल के मर जाएँ 'मुनीर'

    हिन्द में हम पहलू-ए-गोर-ए-ग़रीबाँ हों तो क्या

    स्रोत:

    • पुस्तक : intekhab-e-zarrin (पृष्ठ 141)
    • रचनाकार : Khvaja Mohammad Zakariya
    • प्रकाशन : Sangeet publication (2009)
    • संस्करण : 2009

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