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शेर
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
बैठे हैं अपनी सीट पर कैसे भगाएँ मास्टर
आए हैं दे के फ़ीस हम कोई हमें भगाए क्यों
कैफ़ अहमद सिद्दीकी
शेर
अकबर इलाहाबादी
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नज़्म
दूसरे दर्जे की पिछली क़तार का आदमी
और नए जोड़ों की ख़ुशियों में छुपा जो कर्ब है वो भी हूँ मैं
फ़ीस में स्कूल की कापी किताबों में भी मैं
शकील आज़मी
ग़ज़ल
अनुभव ज़िंदगी की सब से अच्छी पाठशाला है
मगर कम्बख़्त उस की फ़ीस इतनी है कि तौबा है
डॉ अंजना सिंह सेंगर
नज़्म
राएगाँ सुब्ह की चिता पर
और वो ग़रीब तालिब-ए-इल्म की वो फ़ीस नहीं था
जो एक एक पैसे से मिल कर बनती है
तनवीर अंजुम
नज़्म
ख़ुद-फ़रामोशी
चला था घर से कि बच्चे की फ़ीस देनी थी
कहा था बीवी ने बेच आऊँ बालियाँ उस की
सुलैमान अरीब हैदराबादी
हास्य
बुकिंग-ऑफ़िस का बाबू आप की आसान कर देगा
वो मुश्किल हल करेगा और अपनी फ़ीस ले लेगा




