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नज़्म
हुब्ब-ए-वतन
हम भी हुब्ब-ए-वतन में हैं गो ग़र्क़
हम में और उन में है मगर ये फ़र्क़
अल्ताफ़ हुसैन हाली
नज़्म
ख़ाक-ए-हिंद
गुल शम-ए-अंजुमन है गो अंजुमन वही है
हुब्ब-ए-वतन वही है ख़ाक-ए-वतन वही है
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
लब पे पाबंदी तो है
है जिन्हें सब से ज़ियादा दावा-ए-हुब्बुलवतन
आज उन की वज्ह से हुब्ब-ए-वतन रुस्वा तो है
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
जुम्बिश-ए-हर-बर्ग से है गुल के लब को इख़्तिलाज
हुब्ब-ए-शबनम से सबा हर सुब्ह करती है ‘इलाज
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
ख़ातून-ए-मशरिक़
देख तुझ पर इल्म की भरपूर पड़ जाए न ज़र्ब
भाग इस पर्दे में हैं शैतान के आलात-ए-हर्ब
जोश मलीहाबादी
नज़्म
सय्यद से आज हज़रत-ए-वाइ'ज़ ने ये कहा
शैतान ने दिखा के जमाल-ए-उरूस-ए-दहर
बंदा बना दिया है तुझे हुब्ब-ए-जाह का
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
तज्रबे ने हुब्ब-ए-दुनिया से सिखाया एहतिराज़
पहले कहते थे फ़क़त मुँह से और अब करना पड़ा
अकबर इलाहाबादी
ग़ज़ल
दिल किए तस्ख़ीर बख़्शा फ़ैज़-ए-रूहानी मुझे
हुब्ब-ए-क़ौमी हो गया नक़्श-ए-सुलैमानी मुझे
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
दर्द-ए-दिल
मस्त हूँ हुब्ब-ए-वतन से कोई मय-ख़्वार नहीं
मुझ को मग़रिब की नुमाइश से सरोकार नहीं

