aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम ".jmun"
जौन एलिया
1931 - 2002
शायर
जान मानयोल मार्कस
लेखक
मोहम्मद ज़ुन्नूरैन
एस. एस ऑफसेट, जम्मू
पर्काशक
आज़ाद बुक वीज़न, जम्मू
चाँद प्रेस, जम्मू
जम्मू प्रिंटिंग प्रेस, जम्मू
मानवी प्रकाशन, जम्मु
दी रनबीर गवर्नमेंट प्रेस, जम्मू
जुन्नूरैन अकादमी, सरगोधा
उम्र गुज़रेगी इम्तिहान में क्यादाग़ ही देंगे मुझ को दान में क्या
जो गुज़ारी न जा सकी हम सेहम ने वो ज़िंदगी गुज़ारी है
नया इक रिश्ता पैदा क्यूँ करें हमबिछड़ना है तो झगड़ा क्यूँ करें हम
कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगेजाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे
तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझेमेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहीं
पाकिस्तान के अग्रणी आधुनिक शायरों में से एक, अपने अपारम्परिक अंदाज़ के लिए मशहूर।
पाकिस्तान के अग्रणी आधुनिक शायरों में से एक, अपने अपारम्परिक अंदाज़ के लिए मशहूर
मूँ مُوں
मुझे
जूँ جُوں
एक छोटा सा कीड़ा जो बालों या कपड़ों में मेल या पसीने से पैदा हो जाता है, स्पुश, चीलड़, काले रंग का सूक्ष्म कीड़ा जो बालों में हो जाता है
भूँ بُھوں
land, earth
आतूँ آتُوں
those coming
यानी
काव्य संग्रह
Goya
Guman
Jaun Eliya-Khush Guzran Guzar Gaye
नसीम सय्यद
मज़ामीन / लेख
Zakhm-e-Umeed
ग़ज़ल
Ramooz
नज़्म
Jaun Eliya Hayat Aur Shayari
नेहा इक़बाल
आलोचना
Mabada
Shayad
Lekin
Tareekh-e-Jammun
मौलवी हश्मतुल्लाह लखनवी
भारत का इतिहास
Kulliyat-e-Jaun Eliya
कुल्लियात
Jaun Eliya Ki Shayeri
मोहम्मद इरशाद
Jammun-o-Kashmeer Mein Urdu Zaban
शहाब इनायत मलिक
Jammun-o-Kashmeer Mein Urdu Novel 1947 Ke Baad
मुशताक़ अहमद गनाई
शोध एवं समीक्षा
बे-क़रारी सी बे-क़रारी हैवस्ल है और फ़िराक़ तारी है
मैं भी बहुत अजीब हूँ इतना अजीब हूँ कि बसख़ुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं
ये मुझे चैन क्यूँ नहीं पड़ताएक ही शख़्स था जहान में क्या
हर बार मेरे सामने आती रही हो तुमहर बार तुम से मिल के बिछड़ता रहा हूँ मैं
हालत-ए-हाल के सबब हालत-ए-हाल ही गईशौक़ में कुछ नहीं गया शौक़ की ज़िंदगी गई
ज़िंदगी किस तरह बसर होगीदिल नहीं लग रहा मोहब्बत में
सारी दुनिया के ग़म हमारे हैंऔर सितम ये कि हम तुम्हारे हैं
ठीक है ख़ुद को हम बदलते हैंशुक्रिया मश्वरत का चलते हैं
मैं तुम्हारे ही दम से ज़िंदा हूँमर ही जाऊँ जो तुम से फ़ुर्सत हो
बे-दिली क्या यूँही दिन गुज़र जाएँगेसिर्फ़ ज़िंदा रहे हम तो मर जाएँगे
बहुत नज़दीक आती जा रही होबिछड़ने का इरादा कर लिया क्या
कौन इस घर की देख-भाल करेरोज़ इक चीज़ टूट जाती है
और मैं जिस ने तुझे अपना मसीहा समझाएक ज़ख़्म और भी पहले की तरह सह जाऊँ
किस लिए देखती हो आईनातुम तो ख़ुद से भी ख़ूबसूरत हो
क्या सितम है कि अब तिरी सूरतग़ौर करने पे याद आती है
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