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नज़्म
बरसात की बहारें
कहती हैं कोई मुझ को जोड़ा सोहा बना दो
या टाट बाफ़ी जूता या कफ़्श-ए-सुर्ख़ ला दो
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
रिश्वत
हल्की टोपी सर पे रखते हैं तो चकराता है सर
और जूते की तरफ़ बढ़िए तो झुक जाता है सर
जोश मलीहाबादी
ग़ज़ल
रिंद ख़ाली हाथ बैठे हैं उड़ा कर जुज़्व ओ कुल
अब न कुछ शीशे में है बाक़ी न पैमाने में है
असग़र गोंडवी
नज़्म
बारिश होती है तो पानी को भी लग जाते हैं पाँव
जीत कर आते हैं जब मैच गली के लड़के
जूते पहने हुए कैनवस के उछलते हुए गेंदों की तरह
गुलज़ार
ग़ज़ल
सितम ये है मैं उस रस्ते पे नंगे पैर चलता हूँ
जहाँ चलते हुए लोगों के जूते टूट जाते है
वसीम नादिर
ग़ज़ल
मक़्सद-ए-इश्क़ हम-आहंगी-ए-जुज़्व-ओ-कुल है
दर्द ही दर्द सही दिल बू-ए-दम-साज़ तो दे
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
तमन्ना-ए-मुहाल-ए-दिल को जुज़्व-ए-ज़िंदगी कर के
फ़साना ज़ीस्त का पेचीदा करता जा रहा हूँ मैं
नुशूर वाहिदी
नज़्म
नशात-ए-उमीद
पाँव में जूती नहीं पर है ये ज़ौक़
घोड़ा जो सब्ज़ा हो तो नीला हो तौक़