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नज़्म
दरख़्त-ए-ज़र्द
ये हम जो हैं हमारी भी तो होगी कोई नौटंकी
हमारा ख़ून भी सच-मुच का सेहने पर बहा होगा
जौन एलिया
ग़ज़ल
तोडूँगा ख़ुम-ए-बादा-ए-अंगूर की गर्दन
रख दूँगा वहाँ काट के इक हूर की गर्दन
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
ग़ज़ल
उठती है अपने दिल से कुछ ऐसी ही हूक सी
पड़ जाती जिस से दश्त में है एक कूक सी
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
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विषय
ख़ून
ख़ून शायरी
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नज़्म
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
शेर
ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
डरे क्यूँ मेरा क़ातिल क्या रहेगा उस की गर्दन पर
वो ख़ूँ जो चश्म-ए-तर से उम्र भर यूँ दम-ब-दम निकले
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
सज़ा
तुम कौन हो ये ख़ुद भी नहीं जानती हो तुम
मैं कौन हूँ ये ख़ुद भी नहीं जानता हूँ मैं

