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do
दो دو
जो गिनती में एक से एक अधिक हो। तीन से एक कम। पद-दो-एक-एक से एक या दो अधिक। कुछ। जैसे-उनसे दो-एक बातें कर लो। दो चार-दो, तीन अथवा चार। कुछ। थोड़ा। जैसे-दो-चार दिन बाद आना। दो दिन की बहुत थोड़े समय का। हाल का। जैसे-यह तो अभी दो दिन की बात है। किसके दोसिर हैं ? = किसे फालतू सिर है ? कौन व्यर्थ अपने प्राण गवाना चाहता है। मुहा०-(आँखें) दो-चार होना = सामना होना। (किसी से) दो-चार होना = भेंट या मुलाकात होना। दो दो बातें करना संक्षिप्त परंतु स्पष्ट प्रश्नोत्तर करना। साफ-साफ कुछ बातें पूछना और कहना। दो नावों पर पैर रखना = दो आश्रमों या दो पक्षों का अवलंबन करना। ऐसी स्थिति में रहना कि जब जिधर चाहे, तब उधर मुड़ या हो सकें।
mo ko
मो को مو کو
मुझ को, मुझे
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ग़ज़ल
दरिया के मद्द-ओ-जज़्र भी पानी के खेल हैं
हस्ती ही के करिश्मे हैं क्या मौत क्या हयात
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
मुझ को भी इल्म ख़ूब है सब मद्द-ओ-जज़्र का
मैं भी तो सब के साथ इन्हीं पानियों में हूँ
मोहसिन ज़ैदी
ग़ज़ल
मैं खोना चाहता हूँ मद्द-ओ-जज़्र-ए-बहर में 'शौकत'
वो साहिल-आश्ना कश्ती का मेरी ना-ख़ुदा क्यूँ हो
शौकत थानवी
ग़ज़ल
ज़माँ मकाँ है फ़क़त मद्द-ओ-जज़्र-ए-जोश-ए-हयात
बस एक मौज की हैं झलकियाँ क़रार-ओ-सबात
फ़िराक़ गोरखपुरी
सलाम
नसीर तुराबी
कुल्लियात
अफ़्साने मा-ओ-मन के सुनें 'मीर' कब तलक
चल अब कि सोवें मुँह पे दुपट्टे को तान कर
मीर तक़ी मीर
नज़्म
गुड़िया
कि जब तुम हाथ को मोड़ो नहीं होगी मुझे तकलीफ़
कि जब तुम आँख को फोड़ो तो चीख़ें भी न निकलेंगी
नील अहमद
ग़ज़ल
न हो आज़ाद दौर-ए-चर्ख़ की हल्क़ा-ब-गोशी से
तिरा मरकूज़ दिल-ए-माओ-शुमा और ईन-ओ-आँ तक है













