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नज़्म
रक़ीब से!
ज़ेर-दस्तों के मसाइब को समझना सीखा
सर्द आहों के रुख़-ए-ज़र्द के मअ'नी सीखे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
शिकवा
आए उश्शाक़ गए वादा-ए-फ़र्दा ले कर
अब उन्हें ढूँड चराग़-ए-रुख़-ए-ज़ेबा ले कर
अल्लामा इक़बाल
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ग़ज़ल
सुब्ह चमन में उस को कहीं तकलीफ़-ए-हवा ले आई थी
रुख़ से गुल को मोल लिया क़ामत से सर्व ग़ुलाम किया
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
रुख़-ए-रौशन से नक़ाब अपने उलट देखो तुम
मेहर-ओ-मह नज़रों से यारों की उतर जाएँगे
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
नज़्म
निसार मैं तेरी गलियों के
चमक उठे हैं सलासिल तो हम ने जाना है
कि अब सहर तिरे रुख़ पर बिखर गई होगी
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
सुब्ह-ए-आज़ादी (अगस्त-47)
पुकारती रहीं बाहें बदन बुलाते रहे
बहुत अज़ीज़ थी लेकिन रुख़-ए-सहर की लगन
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
आवारा
रात हँस हँस कर ये कहती है कि मय-ख़ाने में चल
फिर किसी शहनाज़-ए-लाला-रुख़ के काशाने में चल

