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नज़्म
निसार मैं तेरी गलियों के
है अहल-ए-दिल के लिए अब ये नज़्म-ए-बस्त-ओ-कुशाद
कि संग-ओ-ख़िश्त मुक़य्यद हैं और सग आज़ाद
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
ग़ौर से देखते हैं तौफ़ को आहु-ए-हरम
क्या कहें उस के सग-ए-कूचा के क़ुर्बां होंगे
मोमिन ख़ाँ मोमिन
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ग़ज़ल
मोहज़्ज़ब दोस्त आख़िर हम से बरहम क्यूँ नहीं होंगे
सग-ए-इज़हार को हम भी तो खुल्ला छोड़ देते हैं
शुजा ख़ावर
अप्रचलित ग़ज़लें
पानी से सग-गज़ीदा डरे जिस तरह 'असद'
डरता हूँ आइने से कि मर्दुम-गज़ीदा हूँ
मिर्ज़ा ग़ालिब
हास्य
वो सुहाग-रात जहेज़ में सग-ए-पालतू भी ले आई थी
जो सहर हुई तो पता चला यहाँ तीसरा कोई और है
खालिद इरफ़ान
नज़्म
श्री-कृष्ण
खा के तंदुल कहीं ए'ज़ाज़ सुदामा को दिया
साग ख़ुश हो के 'बिदुर-जी' का किया नोश कहीं


