आह शायरी

उर्दू क्लासिकी शायरी, शब्द और अर्थ की भव्यता का दर्शन और काव्य-शास्त्र है । इस में लफ़्ज़ों के माध्यम से अर्थों का संसार बनाने की कोशिश मिलती है । शब्द के व्यवहार से ही शायरी अस्तित्व में आती है । शब्द निरा शब्द नहीं होता बल्कि शेर के अर्थ निर्धारण में उसका बड़ा रोल होता है । आह भी क्लासिकी शायरी का ऐसा ही एक शब्द है जिसके इर्द-गिर्द अर्थ-शास्त्र की पूरी परंपरा मौजूद है । इस परंपरा में उर्दू शायरी का आशिक़ हमें आहें भरता हुआ नज़र आता है । इस अर्थ-शास्त्र को और समझने की कोशिश कीजिए तो पता चलता है कि आशिक़ जितनी आहें भरता है उसका माशूक़ उतना ही ज़ुल्म करता है । उसका दिल अपने आशिक़ के लिए नहीं पसीजता । यहाँ प्रस्तुत चुनिंदा शायरी में आप उर्दू शायरी के इस अर्थ-शास्त्र और उसकी परंपरा को महसूस करेंगे ।

आह जो दिल से निकाली जाएगी

क्या समझते हो कि ख़ाली जाएगी

those sighs that emerge from this heart so fiiled with pain

do you truly think unanswered these will now remain?

those sighs that emerge from this heart so fiiled with pain

do you truly think unanswered these will now remain?

अकबर इलाहाबादी

आह करता हूँ तो आती है पलट कर ये सदा

आशिक़ों के वास्ते बाब-ए-असर खुलता नहीं

सेहर इश्क़ाबादी

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक

कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक

A prayer needs a lifetime, an answer to obtain

who can live until the time that you decide to deign

A prayer needs a lifetime, an answer to obtain

who can live until the time that you decide to deign

मिर्ज़ा ग़ालिब

आह तो अब भी दिल से उठती है

लेकिन उस में असर नहीं होता

करामत बुख़ारी

'हफ़ीज़' आह आह पर आख़िर

क्या कहें दोस्त वाह वा के सिवा

हफ़ीज़ जालंधरी

अर्श तक जाती थी अब लब तक भी सकती नहीं

रहम जाता है क्यूँ अब मुझ को अपनी आह पर

it cannot even reach my lips, it used to reach the highest skies

I feel compassion at the sorry condition of my sighs

it cannot even reach my lips, it used to reach the highest skies

I feel compassion at the sorry condition of my sighs

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

दर्द उल्फ़त का हो तो ज़िंदगी का क्या मज़ा

आह-ओ-ज़ारी ज़िंदगी है बे-क़रारी ज़िंदगी

ग़ुलाम भीक नैरंग

दर्द-ए-दिल कितना पसंद आया उसे

मैं ने जब की आह उस ने वाह की

आसी ग़ाज़ीपुरी

दिल पर चोट पड़ी है तब तो आह लबों तक आई है

यूँ ही छन से बोल उठना तो शीशे का दस्तूर नहीं

अंदलीब शादानी
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एक ऐसा भी वक़्त होता है

मुस्कुराहट भी आह होती है

जिगर मुरादाबादी
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हम ने हँस हँस के तिरी बज़्म में पैकर-ए-नाज़

कितनी आहों को छुपाया है तुझे क्या मालूम

मख़दूम मुहिउद्दीन
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इधर से भी है सिवा कुछ उधर की मजबूरी

कि हम ने आह तो की उन से आह भी हुई

जिगर मुरादाबादी

कुछ दर्द की शिद्दत है कुछ पास-ए-मोहब्बत है

हम आह तो करते हैं फ़रियाद नहीं करते

फ़ना निज़ामी कानपुरी

मिरी आह का तुम असर देख लेना

वो आएँगे थामे जिगर देख लेना

दाग़ देहलवी
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मुश्किल है रोक आह-ए-दिल-ए-दाग़दार की

कहते हैं सौ सुनार की और इक लुहार की

सफ़ी औरंगाबादी
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पूछा अगर किसी ने मिरा के हाल-ए-दिल

बे-इख़्तियार आह लबों से निकल गई

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

वो कौन था वो कहाँ का था क्या हुआ था उसे

सुना है आज कोई शख़्स मर गया यारो

शहरयार

वो माज़ी जो है इक मजमुआ अश्कों और आहों का

जाने मुझ को इस माज़ी से क्यूँ इतनी मोहब्बत है

अख़्तर अंसारी

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