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शाद लखनवी

1805 - 1899

ग़ज़ल 52

शेर 18

वो नहा कर ज़ुल्फ़-ए-पेचाँ को जो बिखराने लगे

हुस्न के दरिया में पिन्हाँ साँप लहराने लगे

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जवानी से ज़ियादा वक़्त-ए-पीरी जोश होता है

भड़कता है चराग़-ए-सुब्ह जब ख़ामोश होता है

passion runneth stronger in dotage than in youth

the flame flickers burning brighter ere it dies forsooth

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इश्क़-ए-मिज़्गाँ में हज़ारों ने गले कटवाए

ईद-ए-क़ुर्बां में जो वो ले के छुरी बैठ गया

पुस्तकें 1

Sukhan-e-Bemisal: Deewan-e-Shad

 

1901

 

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