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मीर तस्कीन देहलवी

1803 - 1851

ग़ज़ल 12

शेर 11

जिस वक़्त नज़र पड़ती है उस शोख़ पे 'तस्कीं'

क्या कहिए कि जी में मेरे क्या क्या नहीं होता

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क़ासिद आया है वहाँ से तू ज़रा थम तो सही

बात तो करने दे उस से दिल-ए-बेताब मुझे

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शब-ए-विसाल में सुनना पड़ा फ़साना-ए-ग़ैर

समझते काश वो अपना राज़दार मुझे

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पुस्तकें 3

Deewan-e-Taskeen

 

 

इंतिख़ाब-ए-कलाम

 

1970

Urdu Adab,New Delhi

Deewan-e-Taskeen : Shumara Number-003

1965

 

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