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मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

1809 - 1869 | दिल्ली, भारत

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

ग़ज़ल 25

शेर 14

इज़हार-ए-इश्क़ उस से करना था 'शेफ़्ता'

ये क्या किया कि दोस्त को दुश्मन बना दिया

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इतनी बढ़ा पाकी-ए-दामाँ की हिकायत

दामन को ज़रा देख ज़रा बंद-ए-क़बा देख

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हम तालिब-ए-शोहरत हैं हमें नंग से क्या काम

बदनाम अगर होंगे तो क्या नाम होगा

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जिस लब के ग़ैर बोसे लें उस लब से 'शेफ़्ता'

कम्बख़्त गालियाँ भी नहीं मेरे वास्ते

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शायद इसी का नाम मोहब्बत है 'शेफ़्ता'

इक आग सी है सीने के अंदर लगी हुई

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पुस्तकें 14

Deewan-e-Shefta

 

1965

Deewan-e-Shefta

 

 

Deewan-e-Shefta

 

1954

दीवान-ए-शेफ़ता

 

1985

Gulshan-e-Bekhar

 

1982

Gulshan-e-Bekhar

 

1998

गुलशन-ए-बेख़ार

 

1962

गुलशन-ए-बेख़ार

 

1874

Gulshan-e-Be-Khar

 

1982

हज़रत शेफ़्ता के मुख़्तसर हालात

 

1915

चित्र शायरी 3

हज़ार दाम से निकला हूँ एक जुम्बिश में जिसे ग़ुरूर हो आए करे शिकार मुझे

शायद इसी का नाम मोहब्बत है 'शेफ़्ता' इक आग सी है सीने के अंदर लगी हुई

 

ऑडियो 9

इधर माइल कहाँ वो मह-जबीं है

इश्क़ की मेरे जो शोहरत हो गई

कहूँ मैं क्या कि क्या दर्द-ए-निहाँ है

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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