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तअशशुक़ लखनवी

1824 - 1892

ग़ज़ल 13

शेर 28

हम किस को दिखाते शब-ए-फ़ुर्क़त की उदासी

सब ख़्वाब में थे रात को बेदार हमीं थे

आमद आमद है ख़िज़ाँ की जाने वाली है बहार

रोते हैं गुलज़ार के दर बाग़बाँ खोले हुए

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जिस तरफ़ बैठते थे वस्ल में आप

उसी पहलू में दर्द रहता है

ई-पुस्तक 14

Afkar-e-Tashshuq

Volume-002

1953

Afkar-e-Tashshuq

Volume-001

1950

बराहीन-ए-ग़म

खण्ड-001

1927

दीवान-ए-हज़रत तअश्शुक़

 

 

दीवान-ए-तअाशुक़ अलयहिर्रहमा

 

 

Guldasta-e-Tashshuq

 

1874

Tashshuq Lakhnavi : Hayat, Shakhsiyat, Fan Aur Kalam

 

2007

हदीस-ए-दिल

शुमारा नम्बर-023

2008

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