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रिन्द लखनवी

1797 - 1857 | लखनऊ, भारत

ग़ज़ल 36

शेर 51

टूटे बुत मस्जिद बनी मिस्मार बुत-ख़ाना हुआ

जब तो इक सूरत भी थी अब साफ़ वीराना हुआ

चाँदनी रातों में चिल्लाता फिरा

चाँद सी जिस ने वो सूरत देख ली

काबे को जाता किस लिए हिन्दोस्ताँ से मैं

किस बुत में शहर-ए-हिन्द के शान-ए-ख़ुदा थी

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पुस्तकें 7

दीवान-ए-रिंद

गुलदस्ता-ए-इश्क

1930

दीवान-ए-रिंद

गुलदस्ता-ए-इश्क

1906

Deewan-e-Rind

 

 

Deewan-e-Rind

Guldasta-e-Ishq

1898

Intekhab-e-Sukhan

Volume-007, Part-002

1935

इंतिख़ाब-ए-रिंद

 

1983

Nawab Syed Mohammad Khan Rind

 

1996

 

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