फ़लक शायरी

मत सहल हमें जानो फिरता है फ़लक बरसों

तब ख़ाक के पर्दे से इंसान निकलते हैं

मीर तक़ी मीर

इधर फ़लक को है ज़िद बिजलियाँ गिराने की

उधर हमें भी है धुन आशियाँ बनाने की

अज्ञात

गुनगुनाती हुई आती हैं फ़लक से बूँदें

कोई बदली तिरी पाज़ेब से टकराई है

क़तील शिफ़ाई

वो चार चाँद फ़लक को लगा चला हूँ 'क़मर'

कि मेरे बा'द सितारे कहेंगे अफ़्साने

क़मर जलालवी

दौलत का फ़लक तोड़ के आलम की जबीं पर

मज़दूर की क़िस्मत के सितारे निकल आए

नुशूर वाहिदी

फ़लक पर उड़ते जाते बादलों को देखता हूँ मैं

हवा कहती है मुझ से ये तमाशा कैसा लगता है

अब्दुल हमीद

आँसू फ़लक की आँख से टपके तमाम रात

और सुब्ह तक ज़मीन का आँचल भिगो गए

ज़हीर अहमद ज़हीर

फ़लक की ख़बर कब है ना-शाइरों को

यूँही घर में बैठे हवा बाँधते हैं

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी