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स्वप्निल तिवारी

1984 | मुंबई, भारत

चित्र शायरी 1

धीरे धीरे ढलते सूरज का सफ़र मेरा भी है शाम बतलाती है मुझ को एक घर मेरा भी है जिस नदी का तू किनारा है उसी का मैं भी हूँ तेरे हिस्से में जो है वो ही भँवर मेरा भी है एक पगडंडी चली जंगल में बस ये सोच कर दश्त के उस पार शायद एक घर मेरा भी है फूटते ही एक अंकुर ने दरख़्तों से कहा आसमाँ इक चाहिए मुझ को कि सर मेरा भी है आज बेदारी मुझे शब भर ये समझाती रही इक ज़रा सा हक़ तुम्हारे ख़्वाबों पर मेरा भी है मेरे अश्कों में छुपी थी स्वाती की इक बूँद भी इस समुंदर में कहीं पर इक गुहर मेरा भी है शाख़ पर शब की लगे इस चाँद में है धूप जो वो मिरी आँखों की है सो वो समर मेरा भी है तू जहाँ पर ख़ाक उड़ाने जा रहा है ऐ जुनूँ हाँ उन्हीं वीरानियों में इक खंडर मेरा भी है जान जाते हैं पता 'आतिश' धुएँ से सब मिरा सोचता रहता हूँ क्या कोई मफ़र मेरा भी है

 

वीडियो 9

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वीडियो का सेक्शन
शायर अपना कलाम पढ़ते हुए
ऐसी अच्छी सूरत निकली पानी की

स्वप्निल तिवारी

किरन इक मोजज़ा सा कर गई है

स्वप्निल तिवारी

किसी ने भी न मेरी ठीक तर्जुमानी की

स्वप्निल तिवारी

धूप के भीतर छुप कर निकली

स्वप्निल तिवारी

नदी की लय पे ख़ुद को गा रहा हूँ

स्वप्निल तिवारी

मुँह अँधेरे तेरी यादों से निकलना है मुझे

स्वप्निल तिवारी

मिली है राहत हमें सफ़र से

स्वप्निल तिवारी

मिली है राहत हमें सफ़र से

स्वप्निल तिवारी

समाअतों में बहुत दूर की सदा ले कर

स्वप्निल तिवारी

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