इसहाक़ विरदग

ग़ज़ल 16

अशआर 4

बाज़ार हैं ख़ामोश तो गलियों पे है सकता

अब शहर में तन्हाई का डर बोल रहा है

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ऐसी तरक़्क़ी पर तो रोना बनता है

जिस में दहशत-गर्द क्रोना बनता है

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किसी की याद मनाने में ईद गुज़रेगी

सो शहर-ए-दिल में बहुत दूर तक उदासी है

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ख़ैरात में दे आया हूँ जीती हुई बाज़ी

दुनिया ये समझती है कि मैं हार गया हूँ

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