ग़ज़ल 15

शेर 3

बाज़ार हैं ख़ामोश तो गलियों पे है सकता

अब शहर में तन्हाई का डर बोल रहा है

ऐसी तरक़्क़ी पर तो रोना बनता है

जिस में दहशत-गर्द क्रोना बनता है

किसी की याद मनाने में ईद गुज़रेगी

सो शहर-ए-दिल में बहुत दूर तक उदासी है

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