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नरजिस अफ़रोज़ ज़ैदी

1964 | पेशावर, पाकिस्तान

ग़ज़ल 9

शेर 2

सुना है फूल झड़े थे जहाँ तिरे लब से

वहाँ बहार उतरती है रोज़ शाम के साथ

तिरे ख़याल से रौशन है सर-ज़मीन-ए-सुख़न

कि जैसे ज़ीनत-ए-शब हो मह-ए-तमाम के साथ

 

पुस्तकें 1

मोहब्बत आसमाँ है

 

2006

 

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