ग़ज़ल 20

शेर 18

अजीब दर्द का रिश्ता था सब के सब रोए

शजर गिरा तो परिंदे तमाम शब रोए

अब आसमान भी कम पड़ रहे हैं उस के लिए

क़दम ज़मीन पर रक्खा था जिस ने डरते हुए

उठा उठा के तिरे नाज़ ग़म-ए-दुनिया

ख़ुद आप ही तिरी आदत ख़राब की हम ने

ई-पुस्तक 1

दिये में जल्ती रात

 

2003

 

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