ग़ज़ल 20

शेर 18

अजब नहीं दर-ओ-दीवार जैसे हो जाएँ

हम ऐसे लोग जो ख़ुद से कलाम करते हैं

किनारा कर दुनिया मिरी हस्त-ए-ज़बूनी से

कोई दिन में मिरा रौशन सितारा होने वाला है

कोई कब दीवार बना है मेरे सफ़र में

ख़ुद ही अपने रस्ते की दीवार रहा हूँ

ई-पुस्तक 1

दिये में जल्ती रात

 

2003

 

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