ग़ज़ल 28

शेर 25

उठा रखी है किसी ने कमान सूरज की

गिरा रहा है मिरे रात दिन निशाने से

कुछ देर ठहर और ज़रा देख तमाशा

नापैद हैं ये रौनक़ें इस ख़ाक से बाहर

कभी क़तार से बाहर कभी क़तार के बीच

मैं हिज्र-ज़ाद हुआ ख़र्च इंतिज़ार के बीच

ई-पुस्तक 2

Dhundli Tasveer

 

1993

गुमाँ आबाद

 

2013

 

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