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अकबर हमीदी

1935 | इस्लामाबाद, पाकिस्तान

ग़ज़ल 20

शेर 18

कोई नादीदा उँगली उठ रही है

मिरी जानिब इशारा हो रहा है

हू-ब-हू आप ही की मूरत है

ज़िंदगी कितनी ख़ूबसूरत है

फ़नकार ब-ज़िद है कि लगाएगा नुमाइश

मैं हूँ कि हर इक ज़ख़्म छुपाने में लगा हूँ

ई-पुस्तक 3

Har Ek Taraf Se

 

2001

पहाड़ मु़झे बुलाता है

 

2003

Shor-e-Badban

 

 

 

"इस्लामाबाद" के और शायर

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