सरफ़राज़ ज़ाहिद

ग़ज़ल 19

शेर 29

मोहब्बत आम सा इक वाक़िआ' था

हमारे साथ पेश आने से पहले

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आँसू नहीं बना सो हम ने

उजलत में क़हक़हा बनाया

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साल गुज़र जाता है सारा

और कैलन्डर रह जाता है

वो एक ख़्वाब में मेरे क़रीब आए अगर

मैं सारे शहर की नींदें ख़रीद सकता हूँ

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ज़िंदा इकट्ठे हो रहे हैं

लगता है कोई मर गया है

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पुस्तकें 1

Lafzon Se Pahle

 

2014

 

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