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अब्दुल हमीद

1953 | इलाहाबाद, भारत

अब्दुल हमीद

ग़ज़ल 12

शेर 12

फ़लक पर उड़ते जाते बादलों को देखता हूँ मैं

हवा कहती है मुझ से ये तमाशा कैसा लगता है

दिन गुज़रते हैं गुज़रते ही चले जाते हैं

एक लम्हा जो किसी तरह गुज़रता ही नहीं

लौट गए सब सोच के घर में कोई नहीं है

और ये हम कि अंधेरा कर के बैठ गए हैं

ये क़ैद है तो रिहाई भी अब ज़रूरी है

किसी भी सम्त कोई रास्ता मिले तो सही

लोगों ने बहुत चाहा अपना सा बना डालें

पर हम ने कि अपने को इंसान बहुत रक्खा

पुस्तकें 5

Harf-o-Hikayat

 

1956

Inqilab-e-Hind Aur Musalman

 

 

नूर-ए-कामिल

 

 

Teen Sandesh

 

 

उम्मत की माएँ

 

1955

 

ऑडियो 12

अभी साज़-ए-दिल में तराने बहुत हैं

अजीब शय है कि सूरत बदलती जाती है

उसे देख कर अपना महबूब प्यारा बहुत याद आया

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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