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अब्दुल हमीद

1953 | इलाहाबाद, भारत

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फ़लक पर उड़ते जाते बादलों को देखता हूँ मैं

हवा कहती है मुझ से ये तमाशा कैसा लगता है

लौट गए सब सोच के घर में कोई नहीं है

और ये हम कि अंधेरा कर के बैठ गए हैं

दिन गुज़रते हैं गुज़रते ही चले जाते हैं

एक लम्हा जो किसी तरह गुज़रता ही नहीं

ये क़ैद है तो रिहाई भी अब ज़रूरी है

किसी भी सम्त कोई रास्ता मिले तो सही

लोगों ने बहुत चाहा अपना सा बना डालें

पर हम ने कि अपने को इंसान बहुत रक्खा

उतरे थे मैदान में सब कुछ ठीक करेंगे

सब कुछ उल्टा सीधा कर के बैठ गए हैं

दूर बस्ती पे है धुआँ कब से

क्या जला है जिसे बुझाते नहीं

पाँव रुकते ही नहीं ज़ेहन ठहरता ही नहीं

कोई नश्शा है थकन का कि उतरता ही नहीं

एक मिश्अल थी बुझा दी उस ने

फिर अंधेरों को हवा दी उस ने

दम-ब-दम मुझ पे चला कर तलवार

एक पत्थर को जिला दी उस ने

ज़वाल-ए-जिस्म को देखो तो कुछ एहसास हो इस का

बिखरता ज़र्रा ज़र्रा कोई सहरा कैसा लगता है

बरसते थे बादल धुआँ फैलता था अजब चार जानिब

फ़ज़ा खिल उठी तो सरापा तुम्हारा बहुत याद आया