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बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

1727 - 1798 | दिल्ली, भारत

प्रमुख क्लासिकी शायर, मीर तक़ी ‘मीर’ के समकालीन

प्रमुख क्लासिकी शायर, मीर तक़ी ‘मीर’ के समकालीन

ग़ज़ल 21

शेर 6

अर्श तक जाती थी अब लब तक भी सकती नहीं

रहम जाता है क्यूँ अब मुझ को अपनी आह पर

it cannot even reach my lips, it used to reach the highest skies

I feel compassion at the sorry condition of my sighs

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लहू टपका किसी की आरज़ू से

हमारी आरज़ू टपकी लहू से

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सीरत के हम ग़ुलाम हैं सूरत हुई तो क्या

सुर्ख़ सफ़ेद मिट्टी की मूरत हुई तो क्या

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पुस्तकें 3

दीवान-ए-बयान

 

2004

दीवान-ए-बयान

 

 

Intikhab-e-Deewan

 

 

 

ऑडियो 10

इश्वा है नाज़ है ग़म्ज़ा है अदा है क्या है

कोई किसी का कहीं आश्ना नहीं देखा

ज़ुल्फ़ तेरी ने परेशाँ किया ऐ यार मुझे

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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