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बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

1727 - 1798 | दिल्ली, भारत

प्रमुख क्लासिकी शायर, मीर तक़ी ‘मीर’ के समकालीन

प्रमुख क्लासिकी शायर, मीर तक़ी ‘मीर’ के समकालीन

अर्श तक जाती थी अब लब तक भी सकती नहीं

रहम जाता है क्यूँ अब मुझ को अपनी आह पर

it cannot even reach my lips, it used to reach the highest skies

I feel compassion at the sorry condition of my sighs

लहू टपका किसी की आरज़ू से

हमारी आरज़ू टपकी लहू से

सीरत के हम ग़ुलाम हैं सूरत हुई तो क्या

सुर्ख़ सफ़ेद मिट्टी की मूरत हुई तो क्या

कोई समझाईयो यारो मिरा महबूब जाता है

मिरा मक़्सूद जाता है मिरा मतलूब जाता है

दिलबरों के शहर में बेगानगी अंधेर है

आश्नाई ढूँडता फिरता हूँ मैं ले कर दिया

हम सरगुज़िश्त क्या कहें अपनी कि मिस्ल-ए-ख़ार

पामाल हो गए तिरे दामन से छूट कर