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ग़ुलाम भीक नैरंग

1876 - 1952 | लाहौर, पाकिस्तान

ग़ज़ल 7

नज़्म 1

 

शेर 7

दर्द उल्फ़त का हो तो ज़िंदगी का क्या मज़ा

आह-ओ-ज़ारी ज़िंदगी है बे-क़रारी ज़िंदगी

कहते हैं ईद है आज अपनी भी ईद होती

हम को अगर मयस्सर जानाँ की दीद होती

मेरे पहलू में तुम आओ ये कहाँ मेरे नसीब

ये भी क्या कम है तसव्वुर में तो जाते हो

ई-पुस्तक 1

कलाम-ए-नेरंग

 

1983

 

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