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कहानी
मुशर्रफ़ आलम ज़ौक़ी
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नज़्म
ग़ालिब
गुड़गुड़ाती हुई पान की पीकों में वो दाद वो वाह वा
चंद दरवाज़ों पे लटके हुए बोसीदा से कुछ टाट के पर्दे
गुलज़ार
ग़ज़ल
रफ़्ता रफ़्ता ग़ैर अपनी ही नज़र में हो गए
वाह-री ग़फ़्लत तुझे अपना समझ बैठे थे हम
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
वाह-रे शौक़-ए-शहादत कू-ए-क़ातिल की तरफ़
गुनगुनाता रक़्स करता झूमता जाता हूँ मैं
जिगर मुरादाबादी
ग़ज़ल
रश्हा-ए-शबनम बहार-ए-गुल फ़रोग़-ए-मेहर-ओ-माह
वाह क्या अशआर हैं दीवान-ए-फ़ितरत देखिए
जोश मलीहाबादी
ग़ज़ल
दूर चश्म-ए-बद तिरी बज़्म-ए-तरब से वाह वाह
नग़्मा हो जाता है वाँ गर नाला मेरा जाए है
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
एक मकड़ा और मक्खी
मकड़े ने कहा वाह फ़रेबी मुझे समझे
तुम सा कोई नादान ज़माने में न होगा

