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ग़ज़ल
आपस में आज दस्त-ओ-गरेबाँ है रोज़ ओ शब
ऐ मेहर-वश ज़री का नहीं मू-ए-बाफ़-ए-ज़ुल्फ़
बहादुर शाह ज़फ़र
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नज़्म
दिल्ली दंगों के बीच
धर्म के नाम पे क़ातिल की हिमायत करना
और फिर मुल्क के जलने की शिकायत करना
आशू मिश्रा
ग़ज़ल
जो दिल का राज़ बे-आह-ओ-फ़ुग़ाँ कहना ही पड़ता है
तो फिर अपने क़फ़स को आशियाँ कहना ही पड़ता है
जगन्नाथ आज़ाद
ग़ज़ल
अंग अंग झलक उठता है अंगों के दर्पन के बीच
मानसरोवर उमडे उमडे हैं भरपूर बदन के बीच