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ग़ज़ल
आपस में आज दस्त-ओ-गरेबाँ है रोज़ ओ शब
ऐ मेहर-वश ज़री का नहीं मू-ए-बाफ़-ए-ज़ुल्फ़
बहादुर शाह ज़फ़र
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नज़्म
दिल्ली दंगों के बीच
धर्म के नाम पे क़ातिल की हिमायत करना
और फिर मुल्क के जलने की शिकायत करना
आशू मिश्रा
ग़ज़ल
जो दिल का राज़ बे-आह-ओ-फ़ुग़ाँ कहना ही पड़ता है
तो फिर अपने क़फ़स को आशियाँ कहना ही पड़ता है
जगन्नाथ आज़ाद
ग़ज़ल
अंग अंग झलक उठता है अंगों के दर्पन के बीच
मानसरोवर उमडे उमडे हैं भरपूर बदन के बीच
अहसन अहमद अश्क
शेर
अकबर अली खान अर्शी जादह
ग़ज़ल
जो बीच में आइना हो प्यारे इधर हमारे उधर तुम्हारे
तो फिर हों बाहम-दिगर नज़ारे इधर हमारे उधर तुम्हारे
शाद लखनवी
ग़ज़ल
फ़र्श-ए-ख़ाक अब अहल-ए-मसनद को नहीं होता नसीब
बोरिया-बाफ़ आज ज़ेब-ए-तख़्त-ए-सुल्ताँ हों तो क्या