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ग़ज़ल
सिराज औरंगाबादी
नज़्म
परछाइयाँ
धड़कते दिल से लरज़ती हुई निगाहों से
हुज़ूर-ए-ग़ैब में नन्ही सी इल्तिजा की थी
साहिर लुधियानवी
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ग़ज़ल
उमीदें मिल गईं मिट्टी में दौर-ए-ज़ब्त-ए-आख़िर है
सदा-ए-ग़ैब बतला दे हमें हुक्म-ए-ख़ुदा क्या है
चकबस्त बृज नारायण
ग़ज़ल
अब कोई छू के क्यूँ नहीं आता उधर सिरे का जीवन-अंग
जानते हैं पर क्या बतलाएँ लग गई क्यूँ पर्वाज़ में चुप
उबैदुल्लाह अलीम
नज़्म
हिण्डोला
इसी हिंडोले में 'विद्यापति' का कंठ खुला
इसी ज़मीन के थे लाल 'मीर' ओ 'ग़ालिब' भी
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
तुम यूँ ही समझना कि फ़ना मेरे लिए है
पर ग़ैब से सामान-ए-बक़ा मेरे लिए है
मौलाना मोहम्मद अली जौहर
नज़्म
आधी रात
इक एक कर के फ़सुर्दा चराग़ों की पलकें
झपक गईं जो खुली हैं झपकने वाली हैं
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
शाम-ए-अयादत
ये किस की महकी महकी साँसें ताज़ा कर गईं दिमाग़
शबों के राज़ नूर-ए-मह की नर्मियाँ लिए हुए









