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ग़ज़ल
कहूँ मैं जिस से उसे होवे सुनते ही वहशत
फिर अपना क़िस्सा-ए-वहशत कहूँ तो किस से कहूँ
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
क़यामत है कि होवे मुद्दई का हम-सफ़र 'ग़ालिब'
वो काफ़िर जो ख़ुदा को भी न सौंपा जाए है मुझ से
मिर्ज़ा ग़ालिब
नज़्म
मुफ़्लिसी
कोने में जाले लपटे हैं छप्पर में मकड़ियाँ
पैसा न होवे जिन के जलाने को लकड़ियाँ
नज़ीर अकबराबादी
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नज़्म
रोटियाँ
रूखी ही रोटी हक़ में हमारे है शहद-ओ-शीर
या पतली होवे मोटी ख़मीरी हो या फ़तीर
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
होवे इक क़तरा जो ज़हराब-ए-मोहब्बत का नसीब
ख़िज़्र फिर तो चश्मा-ए-आब-ए-बक़ा क्या चीज़ है
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
नहीं इक़लीम-ए-उल्फ़त में कोई तूमार-ए-नाज़ ऐसा
कि पुश्त-ए-चश्म से जिस की न होवे मोहर उनवाँ पर
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
वस्ल में गर होवे मुझ को रूयत-ए-माह-ए-रजब
रू-ए-जानाँ ही को देखूँ मैं तो क़ुरआँ छोड़ कर
