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ग़ज़ल
साग़र-ए-मय में नहीं परतव-ए-ख़ाल-ए-साक़ी
है कफ़-ए-दुख़्तर-ए-रज़ में सिपर-ए-जाम-ए-शराब
अहमद हुसैन माइल
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हिंदी ग़ज़ल
उस की बंसी से कह दो कि दूजी बस्ती में तान भरे
जब मोहे नहीं छेड़त मोहन मैं क्यूँ कर छेड़ूँ राग सखी
आशु झा 'नक़्क़ाश'
ग़ज़ल
मिरा दिल भी शराब-ए-इश्क़ से लबरेज़ है साक़ी
ये बोतल भी उड़ा कर काग मयख़ाने में रख देना
क़ैसर हैदरी देहलवी
ग़ज़ल
न 'अज़फ़री' से करो नज़्म ओ नस्र का मज़कूर
न जी कुछ इन दिनों अपना दिमाग़ चाग़ नहीं




