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ग़ज़ल
ऐ बुलबुल-ए-दिल यूँ ग़म पी कर मत चहक कि अब लब को सी ले
सब साज़ बुरीदा-हाल हुए अब राग पुराना मुश्किल है
अनीस अब्र
ग़ज़ल
मुझ से कहती है मिरी रूह निकल कर शब-ए-ग़म
देख मैं हूँ तिरे निकले हुए अरमानों में
अब्र अहसनी गनौरी
ग़ज़ल
हैराँ नहीं हैं हम कि परेशाँ नहीं हैं हम
इस पर भी शाकी-ए-ग़म-ए-दौराँ नहीं हैं हम
अब्र अहसनी गनौरी
ग़ज़ल
चलो अच्छा हुआ तुम आ गए दम तोड़ता था मैं
यही दुश्वार थी साअ'त यही था वक़्त मुश्किल का