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ग़ज़ल
अलक़ाब ख़त में जितने बा'द-अज़-सलाम लिक्खे
दुश्मन को दोस्ती के बेहतर मक़ाम लिक्खे
ज़ाकिर उसमानी रावेरी
नज़्म
ब'अद-अज़-मर्ग
एक दो बार नहीं सैकड़ों बार
मैं ने ख़ुद को इंतिहाई बे-बस महसूस किया है
अनवर सेन रॉय
कुल्लियात
राज़ी हूँ गो कि बाद-अज़ सद-साल-ओ-माह देखूँ
अक्सर नहीं तो तुझ को मैं गाह-गाह देखूँ
मीर तक़ी मीर
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नज़्म
ब'अद-अज़-वक़्त
शौक़-ए-मजबूर को बस एक झलक दिखला कर
वाक़िफ़-ए-लज़्ज़त-ए-तकरार न कर देना था
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
ख़ंजर तलाश करता है
ख़ुलूस-ए-दीन को बा'द-अज़-ख़राबी-ए-बिसयार
ज़माना आज मुकर्रर तलाश करता है
बेबाक भोजपुरी
ग़ज़ल
है मुझे बाद-अज़-सवाल-ए-बोसा ख़्वाहिश वस्ल की
ये तमन्ना एक इस साइल के दिल में और है
बहादुर शाह ज़फ़र
कुल्लियात
लिखते गर दो हर्फ़ लुत्फ़-आमेज़ बा’द-अज़-चंद-रोज़
तो भी होता इस दिल-ए-बेताब-ओ-ताक़त को क़रार
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
बा’द-अज़-शिकस्त-ए-ज़ब्त-ए-नज़र बाम-ए-दिल तुझे
दरबान जा रहे हैं लुटेरों पे छोड़ के
सय्यद सबा वास्ती
कुल्लियात
बा'द-अज़-नमाज़ सज्दा इस शुक्र का करूँ हूँ
रोज़ों का चाँद पैदा सब बे-ख़बर रहा है


