aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "baar-baar"
दरबार आलिया मुर्शिदाबाद शरीफ़, पेशावर
पर्काशक
मसऊद बर यज़ीदैन
लेखक
बर-ख़ुरदार बिन महमूद तुरकमान फराही मुम्ताज़
नीली बार पब्लिकेशन्स
अब्दुल बर असरी फ़लाही
मैनेजर बर्र-ए-आज़म बुक एजेंसी, मुरादाबाद
शायर
बर्रे सग़ीर पब्लिकेशन्स, मुल्तान
बशीर बद्र
1935 - 2026
असना बद्र
born.1971
नाज़ बट
बद्र वास्ती
मोहम्मद यूनुस बट
born.1962
बद्र मुनीर
नोमान बद्र
born.1991
मिरा बाई
फ़रेब खाना नहीं बार बार चीख़ता हैनदी की तह से कोई रेगज़ार चीख़ता है
बार बार क्यों आती चिड़ियाबार बार क्यों आती चिड़िया
रुके रुके से क़दम रुक के बार बार चलेक़रार दे के तिरे दर से बे-क़रार चले
क्यूँ चमक उठती है बिजली बार बारऐ सितमगर ले न अंगड़ाई बहुत
ग़ज़ल एक अरबी शब्द है जिसका अर्थ है "महबूबसे बातें करना"। इस्तिलाः में ग़ज़ल शाइरी की उस सिन्फ़ को कहते हैं जिस में बह्र, क़ाफ़िया,और रदीफ़, की रिआयत की जाए। ग़ज़ल के पहले शेर को 'मतला' और आख़िरी शेर जिस में शायर अपना तख़ल्लुस इस्तिमाल करता है 'मक़्ता' कहते हैं।
इस चयन में हमने ज़ुबैर रिज़वी की उन नज़्मों को शामिल किया है जो एक श्रृंखला का हिस्सा हैं और जिनकी शुरुआत "पुरानी बात है" मिसरे से होती है।
इमदाद अली बहर के 20 बेहतरीन शेर
बात بات
लफ़्ज़, बोल, वाक्य, उक्ति, जुमला, बातचीत, कथन
बाट باٹ
तराज़ू पर चीज़ें तौलने का बटखरा, बट्टा
बार بار
मर्तबा, दफ़ा
बै'ई بَیعی
बैअ (बेचने) से आरोपण : बेचने का, बेचा हुआ, बेचा जाने वाला
Bar Bar
गौहर शेख़ पूर्वी
काव्य संग्रह
Ban-Baas
नासिर शहज़ाद
Barf Barf Chingari
अकबर हुसैन अकबर
Bari Bari Aankhen
उपेन्द्र नाथ अश्क
नॉवेल / उपन्यास
बादबान
फ़िल्मी-नग़्मे
Baat Baat Tazgi
साक़िब साही
नात
Ban Baas
काैसर प्रवीन
अफ़साना
Barq Barf Aaina
सीमा फ़रीदी
महिलाओं की रचनाएँ
Barg Barg Khushbu
मोहम्मद अब्दुल मुक़ीत ख़ान
Barg Barg
सुल्तानुल हक़ शहीदी काश्मीरी
नज़्म
Tohfa-e-Shaheem
मोहम्मद मुसाहिब अली ख़ान
Islam Aur Aurat
मौलवी मोहम्मद हशमत अली
नारीवाद
Tilism-e-Gauhar-e-Bar
सय्यद मुनीर
दास्तान
लब-ए-मंसूर
धर्म सरूप
संकलन
तज़मीन-ए-बर ग़ज़ल डाक्टर इक़बाल
धोके खाता रहा बार बार आदमीफिर भी करता रहा ए'तिबार आदमी
काठ की हंडिया चढ़ी कब बार बारखो दिया झूटे ने अपना ए'तिबार
ख़याल उसी की तरफ़ बार बार जाता हैमिरे सफ़र की थकन कौन उतार जाता है
बार-बार जीते हैं बार-बार मरते हैंयूँ वफ़ा की दुनिया में अपने दिन गुज़रते हैं
जब बार-बार भेजे गए रुख़्सती के पानतंग आ के मुझ को खाने पड़े रुख़्सती के पान
देता है मुझ को चर्ख़-ए-कुहन बार बार दाग़उफ़ एक मेरा सीना है उस पर हज़ार दाग़
ख़ुदा करे कि ये दिन बार बार आता रहेऔर अपने साथ ख़ुशी का ख़ज़ाना लाता रहे
सूरत न यूँ दिखाए उन्हें बार बार चाँदपैदा करे हसीनों में कुछ ए'तिबार चाँद
नज़र जब हम पे कोई बार बार डालेगाये इल्तिफ़ात तो बे-मौत मार डालेगा
क़दम क़दम पे गिरे उट्ठे बार बार चलेतमाम उम्र इसी तौर हम गुज़ार चले
बार बार एक ही नज़्ज़ारा न दिखलाया करबात दिलकश भी अगर हो तो न दोहराया कर
बार बार रौंदा गया एहसासकुचला गया जज़्बा
ज़ब्त कर आह बार बार न करग़म-ए-उल्फ़त को शर्मसार न कर
मक़्तल से बार बार गुज़ारा गया हमेंख़ंजर से पहले ख़ौफ़ से मारा गया हमें
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