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ग़ज़ल
बारिश-ए-संग-ए-मलामत है ख़िरद का पथराव
अपने सर से हो जिसे प्यार मिरे साथ न आए
सय्यद एहतिशाम हुसैन
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ग़ज़ल
बारिश-ए-संग-ए-मलामत यूँ तो हर जानिब से थी
सर-बुलंद अपनी अना थी मुझ को फ़िक्र-ए-सर न था
जौहर बलियावी
ग़ज़ल
संग-ए-मलामत पैहम बरसे और रुस्वा दिन रात हुए
आप की नगरी में हम आ कर कितने कम-औक़ात हुए


