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ग़ज़ल
बारिश-ए-संग-ए-मलामत है ख़िरद का पथराव
अपने सर से हो जिसे प्यार मिरे साथ न आए
सय्यद एहतिशाम हुसैन
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ग़ज़ल
बारिश-ए-संग-ए-मलामत यूँ तो हर जानिब से थी
सर-बुलंद अपनी अना थी मुझ को फ़िक्र-ए-सर न था
जौहर बलियावी
शेर
हम को ख़बर है शहर में उस के संग-ए-मलामत मिलते हैं
फिर भी उस के शहर में जाना कितना अच्छा लगता है
ताबिश मेहदी
ग़ज़ल
संग-ए-मलामत पैहम बरसे और रुस्वा दिन रात हुए
आप की नगरी में हम आ कर कितने कम-औक़ात हुए
वासिल उस्मानी
नज़्म
ख़त्म हुई बारिश-ए-संग
दोस्तो ख़त्म हुई दीदा-ए-तर की शबनम
थम गया शोर-ए-जुनूँ ख़त्म हुई बारिश-ए-संग
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
ख़ुदा-नुमा है बुत-ए-संग-ए-आस्ताना-ए-इश्क़
चलूँगा पा-ए-निगह बन के सू-ए-ख़ाना-ए-इश्क़
ख़्वाज़ा मोहम्मद वज़ीर
नज़्म
बुज़दिल
हुजूम-ए-संग-ए-अना और ज़ब्त-ए-पैहम ने
मिसाल-ए-रेग-ए-रवाँ बे-क़रार रक्खा है


