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नज़्म
ज़ौक़ ओ शौक़
किस से कहूँ कि ज़हर है मेरे लिए मय-ए-हयात
कोहना है बज़्म-ए-कायनात ताज़ा हैं मेरे वारदात!
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
महफ़िलें बरहम करे है गंजिंफ़ा-बाज़-ए-ख़याल
हैं वरक़-गर्दानी-ए-नैरंग-ए-यक-बुत-ख़ाना हिम हम
मिर्ज़ा ग़ालिब
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ग़ज़ल
याद अय्यामे कि अपने रोज़ ओ शब की जा-ए-बाश
या दर-ए-बाज़-ए-बयाबाँ या दर-ए-मय-ख़ाना था
मीर तक़ी मीर
नज़्म
हिन्द के जाँ-बाज़ सिपाही
सर-ब-कफ़ हिन्द के जाँ-बाज़-ए-वतन लड़ते हैं
तेग़-ए-नौ ले सफ़-ए-दुश्मन में घुसे पड़ते हैं
बर्क़ देहलवी
ग़ज़ल
शहरों शहरों फिरते हैं दीवानों का बहरूप भरे
ख़ुद से छुप कर ख़ुद को ढूँड रहे हैं बाज़े बाज़े लोग
अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा
कुल्लियात
ग़लत और पोच ना-मा’क़ूल बा’ज़े यार कहते हैं
'अलम को कब है वजह-ए-तसमिया लाज़िम समझ देखो
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
तिरे पाक-बाज़-ए-उल्फ़त नहीं हारने के हिम्मत
जो मरेंगे डूब कर भी तो मरेंगे रह के प्यासे
आरज़ू लखनवी
ग़ज़ल
जो सुलूक अब दिल में आवें कर मुझे तक़दीर ने
दस्त ओ बाज़ू बाँध कर तेरे हवाले कर दिया
बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान
ग़ज़ल
क्या कासा-ए-मय लीजिए इस बज़्म में ऐ हम-नशीं
दौर-ए-फ़लक से क्या ख़बर पहुँचेगा लब तक या नहीं
नज़ीर अकबराबादी
कुल्लियात
नक़्ल करते क्या ये सोहबत मुन’अक़िद जब होती बज़्म
बैठ कर कहते थे मुँह पर मेरे बा'ज़े बा'ज़े यार
मीर तक़ी मीर
कुल्लियात
याद अय्यामे कि अपने रोज़ ओ शब की जा-ए-बाश
या दर-ए-बाज़-ए-बयाबाँ या दर-ए-मय-ख़ाना था



