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नज़्म
गोमती
नीमा-ए-शाबान की रातों में आराइश तिरी
तैरते बजरों से रौशन हुस्न-ओ-ज़ेबाइश तिरी
शमा ज़फर मेहदी
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ग़ज़ल
इन नज़रों के बजरों का रुख़ बूझें तो कैसे बूझें
आँखें भी उतनी ही गहरी सागर जितना गहरा है
ताज महजूर
नज़्म
एक ख़्वाब
बजरों से सय्याल सोने की किरनें निकलने लगी थीं
ज़माना मुझे अपने पंजे में लेने को झपटा मगर एक पल में
वज़ीर आग़ा
नज़्म
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
उस के ही बाज़ुओं में और उस को ही सोचते रहे
जिस्म की ख़्वाहिशों पे थे रूह के और जाल भी
परवीन शाकिर
नज़्म
शिकवा
बू-ए-गुल ले गई बैरून-ए-चमन राज़-ए-चमन
क्या क़यामत है कि ख़ुद फूल हैं ग़म्माज़-ए-चमन
अल्लामा इक़बाल
शेर
यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का
वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे
जौन एलिया
नज़्म
औरत ने जनम दिया मर्दों को मर्दों ने उसे बाज़ार दिया
तुलती है कहीं दीनारों में बिकती है कहीं बाज़ारों में
नंगी नचवाई जाती है अय्याशों के दरबारों में
साहिर लुधियानवी
नज़्म
मिरे हमदम मिरे दोस्त!
मैं तुझे गीत सुनाता रहूँ हल्के शीरीं
आबशारों के बहारों के चमन-ज़ारों के गीत
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
मिरे बाज़ुओं में थकी थकी अभी महव-ए-ख़्वाब है चाँदनी
न उठे सितारों की पालकी अभी आहटों का गुज़र न हो
बशीर बद्र
शेर
तिरे आज़ाद बंदों की न ये दुनिया न वो दुनिया
यहाँ मरने की पाबंदी वहाँ जीने की पाबंदी

