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ग़ज़ल
शेख़ साहब आप को बुत-ख़ाने में लाया 'मुनीर'
पीर-ओ-मुर्शिद बंदा-ए-दरगाह ने धोका दिया
मुनीर शिकोहाबादी
ग़ज़ल
अगर वो फ़ित्ना जो तुझ से मिले 'हातिम' तो कह दीजो
कि मंसूबे तिरे सब बंदा-ए-दरगाह जाने है
शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम
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नज़्म
साक़ी
अभी मरदूद-ए-दरगाह-ए-ख़िरद है ताबिश-ए-ईमाँ
अभी मक़्बूल-ए-आलम ज़ुल्मत-ए-औहाम है साक़ी
शमीम फ़ारूक़ बांस पारी
ग़ज़ल
बे-फ़िक्र रहे बंद-ए-नक़ाब-ए-रुख़-ए-जानाँ
हम से कभी क़ुफ़्ल-ए-दर-ए-गुलज़ार न टूटे
करामत अली शहीदी
नज़्म
इंक़िलाब
रांदा-ए-दरगाह हैं किब्र-ओ-ग़ुरूर
ख़ाकसारी ही हुई है बारयाब
अब्दुल मन्नान बेदिल अज़ीमाबादी
नज़्म
मर्सिया बाल-गंगा-धर-तिलक
याद कर के तुझे मज़लूम-ए-वतन रोएँगे
बंदा-ए-रस्म-ए-जफ़ा चैन से अब सोएँगे