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नज़्म
मजबूरियाँ
मता-ए-सोज़-ओ-साज़-ए-ज़िंदगी पैमाना ओ बरबत
मैं ख़ुद को इन खिलौनों से भी अब बहला नहीं सकता
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
मिर्ज़ा 'ग़ालिब'
महफ़िल-ए-हस्ती तिरी बरबत से है सरमाया-दार
जिस तरह नद्दी के नग़्मों से सुकूत-ए-कोहसार
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
नज़्र-ए-दिल
जज़्ब है दिल में मिरे दोनों जहाँ का सोज़-ओ-साज़
बरबत-ए-फ़ितरत का हर नग़्मा सुना सकता हूँ मैं
असरार-उल-हक़ मजाज़
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barbat
बरबत بَرْبَط
(शाब्दिक) बत्तख़ अर्थात हंस का सीना, एक बाजा, जो सितार की तरह होता है, परन्तु उसकी तुंबी बड़ी और लम्बाई कम होती है
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ग़ज़ल
मिरे साग़र में मय है और तिरे हाथों में बरबत है
वतन की सर-ज़मीं में भूक से कोहराम है साक़ी
साहिर लुधियानवी
नज़्म
आज
मेरे बरबत के सीने में नग़्मों का दम घुट गया
तानें चीख़ों के अम्बार में दब गई हैं
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
तौबा का तकल्लुफ़ कौन करे हालात की निय्यत ठीक नहीं
रहमत का इरादा बिगड़ा है बरसात की निय्यत ठीक नहीं
अब्दुल हमीद अदम
नज़्म
मेरे गीत तुम्हारे हैं
तुम से क़ुव्वत ले कर अब मैं तुम को राह दिखाऊँगा
तुम परचम लहराना साथी मैं बरबत पर गाऊँगा
साहिर लुधियानवी
नज़्म
गोरिस्तान-ए-शाही
किस क़दर अश्जार की हैरत-फ़ज़ा है ख़ामुशी
बरबत-ए-क़ुदरत की धीमी सी नवा है ख़ामुशी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
क्या गुल-बदनी है
अंदाज़ है या जज़्बा-ए-गरदूँ-ज़दनी है
आवाज़ है या बरबत-ए-ईमाँ-शिकनी है
जोश मलीहाबादी
नज़्म
माज़ूरी
मैं ने देखा है शिकस्त-ए-साज़-ए-उल्फ़त का समाँ
अब किसी तहरीक पर बरबत उठा सकता नहीं
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
नींद में है अभी कली फूल अभी खिला नहीं
बरबत-ए-इश्क़ पर मगर नग़्मा-ए-दिल छिड़ा नहीं
राजेन्द्र बहादुर माैज
ग़ज़ल
बर्बत-ए-माह पे मिज़राब-ए-फ़ुग़ाँ रख दी थी
मैं ने इक नग़्मा सुनाया था तुम्हें याद नहीं
साग़र निज़ामी
नज़्म
बर्बत-ए-शिकस्ता
यास का धुआँ उट्ठा हर नवा-ए-ख़स्ता से
आह की सदा निकली बर्बत-ए-शिकस्ता से
असरार-उल-हक़ मजाज़
ग़ज़ल
न छेड़ ऐ हम-नशीं अब ज़ीस्त के मायूस नग़्मों को
कि अब बरबत के तारों को बड़ी तकलीफ़ होती है










