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क़ितआ
रुख़्सार हैं या अक्स है बर्ग-ए-गुल-ए-तर का
चाँदी का ये झूमर है कि तारा है सहर का
अहमद नदीम क़ासमी
ग़ज़ल
हस्सास हो दुनिया तो जो नश्तर से है मख़्सूस
वो काम भी मैं बर्ग-ए-गुल-ए-तर से निकालूँ
माहिर अब्दुल हई
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ग़ज़ल
ऐ सबा दे तू मिरे सोख़्ता-जानों को ख़िराज
उन की तुर्बत पे ही कुछ बर्ग-ए-गुल-ए-तर रख दे
शाहिद कमाल
नज़्म
गुल-ए-तर
ऐ गुल-ए-तर किस क़दर दिलकश है नज़्ज़ारा तिरा
हामिल-ए-हुस्न-ए-अज़ल है क़ल्ब-ए-सी-पारा तिरा


