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शेर
साँवले तन पे ग़ज़ब धज है बसंती शाल की
जी में है कह बैठिए अब जय कनहय्या लाल की
इंशा अल्लाह ख़ान इंशा
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ग़ज़ल
ज़मीं अश्कों से दिल की भीगती है तब कहीं जा कर
लबों पे मुस्कुराहट का बसंती फूल खिलता है
संदीप ठाकुर
नज़्म
पेश लफ़्ज़ एक मोहब्बत नामे का
किसी बसंती जिस्म के पहले त्यौहार में
अधूरा छोड़ आया मैं अपना रक़्स





