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ग़ज़ल
कोई वरक़ दिखा जो अश्क-ए-ख़ूँ से तर-ब-तर न हो
कोई ग़ज़ल दिखा जहाँ वो दाग़ जल नहीं रहा
जव्वाद शैख़
ग़ज़ल
ग़म का न दिल में हो गुज़र वस्ल की शब हो यूँ बसर
सब ये क़ुबूल है मगर ख़ौफ़-ए-सहर को क्या करूँ
हसरत मोहानी
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रेख़्ता शब्दकोश
baTaa
बटाبَٹا
वह पड़ी पाई जो भिन्न का स्वरूप सूचित करने के लिए अंश या हर के बीच में लगाई जाती है, जैसे- 3/4 में 3 और 4 के बीच में; भिन्नांक; चिह्न, जैसे- ⅔
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ग़ज़ल
उठ के कपड़े बदल घर से बाहर निकल जो हुआ सो हुआ
रात के बा'द दिन आज के बा'द कल जो हुआ सो हुआ
निदा फ़ाज़ली
ग़ज़ल
इक फूल मेरे पास था इक शम्अ' मेरे साथ थी
बाहर ख़िज़ाँ का ज़ोर था अंदर अँधेरी रात थी
अहमद मुश्ताक़
नज़्म
चेहरा तेरा
नूर से कुछ इस तरह है चश्म तेरी तर-ब-तर
चाँदनी का अक्स जों उतरा हो सत्ह-ए-आब पर













