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ग़ज़ल
जिस को इज़्ज़त दे उसे फिर न करे बे-इज़्ज़त
कुलह-ए-सर न हबाबों की उतारे दरिया
वज़ीर अली सबा लखनवी
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तंज़-ओ-मज़ाह
सय्यद ज़मीर हसन
नज़्म
हुब्ब-ए-वतन
क़ौम दुनिया में जिस की है मुम्ताज़
हो फ़क़ीरी में भी वो बा-एज़ाज़
अल्ताफ़ हुसैन हाली
ग़ज़ल
कहाँ के नाम ओ नसब इल्म क्या फ़ज़ीलत क्या
जहान-ए-रिज़्क़ में तौक़ीर-ए-अहल-ए-हाजत क्या
इफ़्तिख़ार आरिफ़
ग़ज़ल
औरों जैसे हो कर भी हम बा-इज़्ज़त हैं बस्ती में
कुछ लोगों का सीधा-पन है कुछ अपनी अय्यारी है
निदा फ़ाज़ली
ग़ज़ल
रक्खी हरगिज़ न तिरे रुख़ ने रुख़-ए-बद्र की क़द्र
खोई काकुल ने भी आख़िर को शब-ए-क़द्र की क़द्र
